B.A. Second Year 'Economics' Chapter - 1 Definition and Function of money, Value of Money In Hindi
प्रश्न : मुद्रा की परिभाषा दीजिये तथा उसके कार्यो का विवेचन कीजिये ।
( 2011,15,17,18,19)
उत्तर :- मुद्रा वस्तु विनिमय प्रथा की देन है इसका आगमन उन कठिनाइयों के फलस्वरूप हुआ जिनका अनुभव मनुष्य वस्तुओं ने परस्पर विनिमय में किया अत्यंत प्रारंभिक अवस्था में मनुष्य की आवश्यकताएं बहुत ही कम थी अतः वस्तु विनिमय की आवश्यकता ही नहीं थी धीरे-धीरे मनुष्य विकसित हुआ उसकी आवश्यकताएं बड़ी तथा वह समूह एवं समुदायों में रहने लगा अब वह अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएं उत्पादित करने या प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो सकता था वह कुछ वस्तुएं जिनमें विशिष्टता प्राप्त थी उन्हें उत्पादित करता और अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को दूसरों को देने लगा तथा उसके बदले दूसरे से अपनी आवश्यकता कि अन्य वस्तुएं लेने लगा इस प्रकार श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण ने विनिमय व्यवस्था को जन्म दिया
मुद्रा की परिभाषा :- मुद्रा एक ऐसी वस्तु है जो लोगों द्वारा सामान्यता विनिमय में माध्यम के रूप में स्वीकार की जाती है तथा जिसमें वस्तुओं का मूल्य व्यक्त किया जाता है इसलिए मुद्रा में सर्वग्राह्यता एवं क्रय शक्ति का होना आवश्यक है मुद्रा की क्रय शक्ति को ही तरलता कहा जाता है जिसका अर्थ है कि बिना किसी असुविधा तथा हानि के अन्य वस्तुओं तथा तथा सेवाओं का क्रय करना मुद्रा की परिभाषा के संबंध में अर्थशास्त्री एकमत नहीं है कुछ विद्वानों ने मुद्रा की सामान्य स्वीकृति को आधार मानकर मुद्रा को परिभाषित किया है विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुसार मुद्रा की दी गई परिभाषा को निम्न तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है
1. सामान्य स्वीकृति पर आधारित परिभाषाएं :- इस वर्ग की परिभाषाएं मुद्रा के सर्वग्राह्यता गुण पर बल देती है इस वर्ग की परिभाषाओं में मार्शल, राबर्टसन, सेलिगमैन, एली, आदि अर्थशास्त्रियों द्वारा दी गई परिभाषाएं आती है मार्शल मुद्रा के अंतर्गत वे सभी वस्तुएं आती हैं हैं जो वस्तु तथा सीमाओं का भुगतान करके तथा खर्च करने में निसंकोच स्वीकार की जाती हैं
रॉबर्टसन मुद्रा वह वस्तु है जो वस्तुओं के लिए भुगतान या अन्य प्रकार के व्यापारिक दायित्व के भुगतान के रूप के भुगतान के रूप में स्वीकार किया जाता है
सैलिगमैन मुद्रा वह वस्तु है जिसे सामान्य स्वीकृति प्राप्त है ऐली मुद्रा में वे सभी वस्तुएं सम्मिलित हैं जिन्हें समाज में सर्वग्राह्यता प्राप्त है
2. वैधानिक मान्यता पर आधारित परिभाषाएं :- इस मत के समर्थक अर्थशास्त्रियो का विचार है कि किसी भी देश में वही मुद्रा, मुद्रा मानी जा सकती है जिसे सरकार ने मुद्रा घोषित किया हो किसी भी वस्तु की मुद्रा होने के लिए वैधानिक मान्यता आवश्यक है इस मत के प्रतिपादक जर्मनी के प्रोफेसर तथा ब्रिटिश अर्थशास्त्री हाट्रे है
नैप कोई भी वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा घोषित कर दी जाती है मुद्रा बन जाती है
हाट्रे मुद्रा को विधिग्राह्य स्वीकार करने के साथ ही उसे लेखे की इकाई भी माना है जिसमें सभी प्रकार की कीमतों का हिसाब रखा जाए
वर्तमान में मुद्रा के चयन को दृष्टि में रखते हुए नैप की परिभाषा उचित प्रतीत होती है क्योंकि आजकल मुद्रा का चलन सरकार का ही ही दायित्व है
3. मुद्रा द्वारा संपादित कार्यों पर आधारित परिभाषाएं:- इस वर्ग में वे परिभाषाएं आती है जो मुद्रा के कार्यों का वर्णन करती है
काॅल बोर्न मुद्रा वह है जो मूल्यांकन तथा भुगतान का माध्यम हो
हार्टले विदर्स मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करें
निष्कर्ष:- स्पष्टतया उपरोक्त सभी परिभाषाएं संतोषजनक नहीं है उचित परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जिसमें मुद्रा के सभी कार्यों पर प्रकाश पड़े तथा उसकी आधारभूत विशेषताओं का भी उल्लेख हो इस दृष्टिकोण से प्रोफेसर काउथर का उत्तर की परिभाषा अधिक उपयुक्त है जिनके अनुसार मुद्रा वह वस्तु है जो विनिमय के माध्यम तथा ऋणो के भुगतान के रूप में सामान्यतया स्वीकार की जाती है तथा जो मूल्य के मापक एवं संचय के आधार पर कार्य करती है
मुद्रा द्वारा सम्पादित होने वाले कार्यों को निम्न तीन भागों में विभाजित किया गया है
1. प्रारंभिक कार्य : ऐसे कार्य जो प्रत्येक स्थान प्रत्येक समय तथा प्रत्येक अवस्था में मुद्रा द्वारा संपादित किए जाते हैं प्रारंभिक या आधारभूत कार्य कहे जाते हैं मुद्रा के प्रारंभिक कार्य दो हैं
(i). विनिमय का माध्यम : मुद्रा में सामान्य स्वीकृति का गुण है प्रत्येक व्यक्ति इसे स्वीकार करने के लिए तत्पर रहता है वर्तमान में जितना लेनदेन होता है उसका भुगतान अधिकतर मुद्रा के द्वारा होता है इस उत्पादन द्वारा थोक विक्रेता को माल बेचा जाता है बदले में मुद्रा प्राप्त की जाती है थोक विक्रेता फुटकर विक्रेता को सामान बेचता है बदले में मुद्रा प्राप्त करता है तथा फुटकर व्यापारी ग्राहक को मुद्रा के बदले में सामान देता है इस प्रकार समाज के सभी क्रेता विक्रेता उपभोगता व्यापारी अथवा सेवक मालिकों के बीच मुद्रा एक ऐसी कड़ी है जो प्रत्येक वर्ग को प्रतिफल दिलाने में सहायक होती है इस प्रकार वस्तु विनिमय को क्रय तथा विक्रय के रूप में विभक्त करके मुद्रा ने विनिमय को सुगम बना दिया है
मूल्य मापक : समाज में उत्पन्न सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य मुद्रा के रूप में नापा जा सकता है बिना मापक के किसी प्रकार का भी विनिमय संबंधी कार्य नहीं किया जा सकता है किसी भी वस्तु को क्रय करने के पूर्व ही क्रेता उसका मूल्य ज्ञात करना चाहता है इस मूल्य को मुद्रा के ही रूप में व्यक्त किया जा सकता है अतः मुद्रा का दूसरा महत्वपूर्ण प्राथमिक कार्य मूल्यमापन का है
2. सहायक कार्य :- यह कार्य प्रारंभिक कार्य से कम महत्वपूर्ण होते हैं मूल रूप से मुद्रा द्वारा प्रारंभिक कार्य ही किए जाते हैं इसलिए इन्हें सहायक कार्य करते हैं मुद्रा के सहायक कार्य निम्न है
(i). मूल्य का संचय : मुद्रा के प्रचलन के पहले मनुष्य के सामने यह प्रमुख समस्या थी कि अपनी उपयोग से अधिक उत्पादन को भविष्य के लिए किस प्रकार संचित बचत करें वस्तु के रूप में संचित करना संभव नहीं था इसका प्रमुख कारण था वस्तु का अनुपयोगी हो जाना मुद्रा में क्रय शक्ति होती है होती है इसलिए मुद्रा के रूप में वस्तु का संचय किया जा सकता है
(ii). भावी भुगतान का आधार : आधुनिक अर्थव्यवस्था का अधिकांश कार्य साख पर आधारित है साख से तात्पर्य है उधार लेन-देन के माध्यम से क्रय विक्रय करना उधार लेनदेन की क्रिया मौद्रिक जगत में ही संभव है उधार देते समय ब्याज की दर तथा भुगतान की शर्तें मुद्रा में ही निश्चित कर दी जाती है जिससे अन्नदाता एवं प्राप्तकर्ता दोनों को निश्चिन्तता रहती है
(iii). मूल्य का हस्तांतरण : मुद्रा के माध्यम से मूल्यों का हस्तांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान को या एक हाथ से दूसरे हाथ को किया जा सकता है मौद्रिक व्यवस्था में मूल्यों का स्थानांतरण संभव नहीं है
3. आकस्मिक कार्य :- उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त प्रोफेसर किनले ने मुद्रा के चार आकस्मिक कार्यों का उल्लेख किया है
(i). साख का आधार : वर्तमान समय में साख व्यावसायिक प्रगति का आधार स्तंभ है साख का आधार मुद्रा है मुद्रा के ही आधार पर साख पत्रों का का सृजन किया जाता है मुद्रा वह आधार है जिसके आधार पर किसी व्यक्ति की साख का आकलन किया जाता है
(ii). आय का वितरण : किसी देश में जितना उत्पादन होता है उसमें पूजी, भूमि, श्रम, साहस का सहयोग होता है अत: प्रत्येक वर्ग को उसके सहयोग का उचित प्रतिफल मिलना चाहिए मुद्रा में ना केवल समस्त राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया जाता है बल्कि प्रत्येक वर्ग को उसके योगदान के अनुपात में भुगतान भी मुद्रा में किया जाता है
(iii). संपत्ति की तरलता : मुद्रा सबसे तरल संपत्ति है मुद्रा के रूप में धन एवं संपत्तियों को रखा जाता है इसके कारण पूजी की तरलता एवं गतिशीलता में वृद्धि होती है भूमि मकान मशीन आदि स्थित संपत्तियों को मुद्रा के रूप में परिवर्तित करके उन्हें तरल रूप प्रदान कर सकते हैं
(iv). पूजी की उत्पादकता बढ़ाना : मुद्रा के द्वारा ही पूजी को ऐसे विनियोग में हस्तांतरित किया जा सकता है जहां उसकी उत्पादकता तुलनात्मक रूप से अधिक हो इससे पूजी की गतिशीलता और उत्पादकता में वृद्धि होती है
निष्कर्ष : वर्तमान समय में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मुद्रा का महत्वपूर्ण स्थान है मुद्रा के बिना सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक जीवन की सुचारू रूप से चलने की कल्पना ही नहीं की जा सकती है इसलिए मार्शल ने कहा है कि मुद्रा वहश्रधूरी है जिसके चारों ओर अर्थ विज्ञान चक्कर लगाता है
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